हरिद्वार में 2027 कुंभ मेले को दिव्य-भव्य बनाने की तैयारी, परंपराओं की हिफाज़त का आह्वान — शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद
हरिद्वार में 2027 कुंभ मेले को दिव्य-भव्य बनाने की तैयारी
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कम शब्दों में कहें तो, हरिद्वार के ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 2027 में होने वाले कुंभ मेले को "दिव्य और भव्य" रूप में आयोजित करने की सरकार की घोषणा का स्वागत किया है। उन्होंने श्रद्धालुओं के लिए पुण्यकाल के महत्व को बताते हुए धार्मिक परंपराओं को बनाए रखने की अपील की है।
कोरोना के बाद श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या का महत्व
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि कुंभ मेला भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, और इस अवसर पर अधिक से अधिक श्रद्धालुओं का आना ही वास्तव में पुण्य और समृद्धि की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। इसके साथ ही, वह इस बात के प्रति भी स्पष्ट थे कि शासन को सुनिश्चित करना चाहिए कि यह आयोजन परंपराओं के अनुसार हो और इस दौरान श्रद्धालुओं की सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए।
परंपराओं की रक्षा का महत्व
शंकराचार्य ने जोर देते हुए कहा कि यह आवश्यक है कि इस आयोजन में किसी भी प्रकार से परंपराओं से समझौता न किया जाए। कुंभ मेले की भव्यता और दिव्यता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, साथ ही धार्मिक भावना की रक्षा करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। शंकराचार्य ने इस बारे में समाज से अपील की कि वे इस दिशा में सक्रिय रूप से योगदान करें।
प्रस्तावित सुविधाएं और योजनाएं
प्रदेश सरकार ने कुंभ मेले की तैयारी को लेकर कई सुविधाओं और योजनाओं की घोषणा की है। इन योजनाओं में श्रद्धालुओं के लिए बेहतर आवास, स्वच्छता, और सुगम परिवहन की व्यवस्था प्रमुख है। इसके अलावा, शंकराचार्य ने यह भी कहा कि यदि सरकार इन सुझावों पर कार्य करेगी, तो मेले के दौरान श्रद्धालुओं का अनुभव निश्चित रूप से बेहतर होगा।
समाज का योगदान
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने समाज के विभिन्न वर्गों से भी अपील की है कि वे इस पवित्र अवसर को यादगार बनाने के लिए एकजुट होकर काम करें। उन्होंने कहा कि यदि समाज में सौहार्द और सहयोग की भावना बरकरार रहेगी, तो निश्चित रूप से कुंभ का यह आयोजन ऐतिहासिक रूप से सफल होगा।
अखाड़ों की भूमिका
कुंभ मेले के आयोजन में विभिन्न अखाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। शंकराचार्य ने इस बात पर भी बल दिया कि अखाड़े अपनी परंपराओं के अनुसार इस मेले में भाग लें। इससे न केवल धार्मिक भावनाओं को बल मिलेगा, बल्कि संयम और सहिष्णुता की भावना को भी बढ़ावा मिलेगा।
निष्कर्ष
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की बातों से स्पष्ट होता है कि 2027 का कुंभ मेला केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की पहचान और परंपराओं के संरक्षण का एक महत्वपूर्ण अवसर है। सभी को मिलकर इसे सफल और दिव्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
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सादर, टیم डिस्कवरी ऑफ इंडिया
सुमन देवी
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